RESHAM SAHU / Fri, Aug 14, 2026 / Post views : 12
नई दिल्ली। संसद ने माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को मंजूरी दे दी है। लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी पारित हुए इस विधेयक को लेकर अब केंद्र और खनिज संपदा वाले राज्यों के बीच अधिकारों और राजस्व को लेकर बहस तेज हो गई है।
विधेयक का एक प्रमुख प्रावधान राज्यों की ओर से खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और अन्य लेवी को नियंत्रित करने से जुड़ा है। केंद्र सरकार का तर्क है कि खनिज क्षेत्र में एक समान व्यवस्था से निवेश, उत्पादन और कारोबारी माहौल को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, झारखंड और केरल ने इस बदलाव पर गंभीर आपत्ति जताई है। दोनों राज्यों का कहना है कि खनिज संसाधनों से मिलने वाला राजस्व राज्यों की आर्थिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है और केंद्र द्वारा राज्यों की लेवी लगाने की शक्ति सीमित करना संघीय ढांचे तथा राज्यों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
झारखंड के मामले में यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है। राज्य के 2026-27 के बजट में खनिज-युक्त भूमि पर सेस से ₹14,656 करोड़ राजस्व का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में इस तरह की लेवी पर नियंत्रण सीमित होने से राज्य के राजस्व पर संभावित असर को लेकर चिंता स्वाभाविक है।
विपक्षी दलों ने भी विधेयक को लेकर सवाल उठाए हैं और इसे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता से जोड़कर देखा है। वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य राज्यों की स्वायत्तता खत्म करना नहीं, बल्कि खनिज क्षेत्र में अलग-अलग राज्यों की लेवी से पैदा होने वाली असमानता को कम करना है।
अब इस कानून को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इससे खनिज संपदा वाले राज्यों के राजस्व और केंद्र-राज्य संबंधों पर वास्तव में कितना असर पड़ेगा। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राज्यों और केंद्र के बीच राजनीतिक तथा कानूनी बहस और तेज होने की संभावना है।
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